अहोई अष्टमी: क्या है महत्व और व्रत की विधि

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Source: aajtak.intoday.in

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अहोई अष्टमी का व्रत संतान के लिए किया जाता है. इस व्रत को माताएं अपने बच्चों की सलामती के लिए रखती है. लेकिन जिन माताओं को संतान की प्राप्ति नहीं होती वो भी इस व्रत को कर मां अहोई से संतान की मनोकामना करती हैं. अहोई व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है. इस दिन माताएं निर्जला व्रत रखती है. इस साल अहोई 2017, 12 अक्टूबर को है. इस व्रत में भी करवा पूजन किया जाता है. इस दिन महिलाएं तारों और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोलती हैं. अगर आप इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करते हैं तो इस व्रत पर माता अहोई की कथा पढ़ अपना अहोई का व्रत पूरा करें.

अहोई अष्टमी व्रत की महिमा का जितना वर्णन किया जाय कम है. इस एक व्रत से आप अपनी संतान की शिक्षा, करियर, कारोबार और उसके पारिवारिक जीवन की बाधाएं भी दूर कर सकते हैं.

अहोई अष्टमी व्रत का महत्व

अहोई अष्टमी व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. इस दिन अहोई माता (पार्वती) की पूजा की जाती है.

इस दिन महिलाएं व्रत रखकर अपने संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं. जिन लोगों को संतान नहीं हो पा रही हो उनके लिए ये व्रत विशेष है. जिनकी संतान दीर्घायु नहीं होती हो या गर्भ में ही नष्ट हो जाती हो, उनके लिए भी ये व्रत शुभकारी होता है.

सामान्यतः इस दिन विशेष प्रयोग करने से संतान की उन्नति और कल्याण भी होता है. ये उपवास आयुकारक और सौभाग्यकारक होता है.

इस बार अहोई अष्टमी का व्रत 12 अक्टूबर को किया जाएगा

ये है माता अहोई व्रत कथा
कहा जाता है कि एक साहूकार के 7 बेटे और 7 बहुएं थीं. इस साहूकार के 1 बेटी भी थी. एक बार दिवाली के उत्सव पर घर को गोबर व मिट्टी से लीपने के लिए साहूकर की बहुओं के साथ उनकी ननद भी जंगल चली गई. ननद भी अपनी भाभियों के साथ मिट्टी खोदने लगी. ननद जहां मिट्टी खोद रही थी वहीं एक साही अपने बच्चों के साथ सो रही थी. लेकिन ननद की कुल्हाड़ी से लगने से साही के बच्चे की मौत हो गई.
तभी साही ने श्राप से ननद के बच्चे की मौत हो गई. इसके बाद उसके सात बेटों की भी लगातार 7 बच्चों की मौत हो गई. तभी उसे एक दिन उसकी पड़ोसन ने बताया कि तुझे तेरी इस गलती का एहसास है. तू परेशान न हो बल्कि अहोई आठे का व्रत करें.इससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। इसके साथ ही, उन्होंने साहूकारनी को अष्टमी के दिन भगवती माता और साही और साही के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करने को कहा. इसके बाद से साहूकार की बेटी ने हर अहोई आठें पर व्रत किया. जिससे अहोई माता के खुश होने के बाद उसे 7 बेटों की प्राप्ति हुई. तभी से ये परंपरा चली आ रही है कि माताएं अपने बच्चों की सलामती के लिए व्रत करती हैं.

उपवास की विधि

इस दिन भी करवा लेकर पूजा की जाती है. पूजा खत्म हो जाने के बाद अपनी सांस या घर के बुजुर्गों को ये करवा दिया जाता है. करवा पर साड़ी शगुन के पैसे और भोजन देकर पुण्य कमाया जाता है. ऐसा करने से माता अहोई खुश होकर बच्चों की रक्षा करती है.

प्रातः स्नान करके अहोई की पूजा का संकल्प लें. अहोई माता की आकृति , गेरू या लाल रंग से दीवार पर बनायें.

सूर्यास्त के बाद तारे निकलने पर पूजन आरम्भ करें.

पूजा की सामग्री में एक चांदी या सफेद धातु की अहोई, चांदी की मोती की माला, जल से भरा हुआ कलश, दूध-भात, हलवा और पुष्प, दीप आदि रखें.

पहले अहोई माता की रोली, पुष्प, दीप से पूजा करें, उन्हें दूध भात अर्पित करें. फिर हाथ में गेहूं के सात दाने और कुछ दक्षिणा (बयाना) लेकर अहोई की कथा सुनें.

कथा के बाद माला गले में पहन लें और गेहूं के दाने तथा बयाना सासु मां को देकर उनका आशीर्वाद लें.

अब चन्द्रमा को अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण करें.

चांदी की माला को दीवाली के दिन निकाले और जल के छींटे देकर सुरक्षित रख लें.

अहोई व्रत 2017 का शुभ मुहूर्त
पूजा का समय- 1 घंटा 14 मिनट
मुहूर्त- सुबह 6.14 से 7.28 बजे तक
शाम – 6.39 बजे से शुरू
बता दें अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानि दिवाली से सिर्फ 7 दिन पहले मनाई जाती है. या यूं कहे कि ये व्रत करवा चौथ के 4 दिन बाद मनाया जाता है. इस बार अहोई का व्रत 12 अक्टूबर को 6.55 बजे शुरू होगी. ये 13 अक्टूबर को सुबह 4.59 बजे तक चलेगी.

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