महाभारतकालीन लाक्षागृह खोजने के लिए होगी खुदाई

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Source: navbharattimes.indiatimes.com

asi approves excavation at site of mahabharata s house of lacमहाभारतकालीन लाक्षागृह खोजने के लिए होगी खुदाई

संदीप राय, मेरठ
पुरातत्वताओं और स्थानीय इतिहासकारों के वर्षों के अनुरोध के बाद आखिरकार भारतीय पुरातत्व विभाग ने आखिरकार उस स्थान की खुदाई की इजाजत दे दी है जहां स्थानीय लोगों के अनुसार महाभारतकालीन ‘लाक्षागृह’ हो सकता है। यह इलाका उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बरनावा इलाके में है।

भारतीय पुरातत्व विभाग के रिटायर्ड अधिकारी केके शर्मा ने कहा, ‘ महाभारत में लाक्षागृह की महत्वपूर्ण भूमिका है। कौरवों ने लाख से एक महल बनाया था। उनकी योजना इस महल में पांडवों के जिंदा जलाने की थी लेकिन पांडव एक सुरंग के जरिए जिंदा बच निकले थे।’

उन्होंने आगे कहा, ‘वह महल अब बागपत में स्थित है। इस जगह को अब बरनावा कहा जाता है। दरअसल, बरनावा उन पांच गांवों में से एक वर्णाव्रत का ही परिवर्तित नाम है, जिनकी मांग पांडवों ने कौरवों से की थी।’

हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए पुरात्व विभाग के निदेशक (उत्खनन) जितेंदर नाथ ने कहा, ‘प्रस्ताव पर काफी विमर्श करने के बाद हमने दो एएसआई अथॉरिटी को लाइसेंस दिया है। इंस्टिट्यूट ऑफ ऑर्किओलॉजी, लाल किला, नई दिल्ली और हमारा उत्खनन विभाग मिलकर यहां खुदाई करेगा।’

एएसआई के अधिकारियों के मुताबिक, दिसंबर के पहले हफ्ते में शुरू होने वाली खुदाई तीन महीने तक चलेगी। इंस्टिट्यूट ऑफ ऑर्किओलॉजी के छात्र भी इसमें भाग लेंगे।

इस साइट के धार्मिक महत्व के बारे में पूछे जाने पर इंस्टिट्यूट ऑफ ऑर्किओलॉजी के निदेशक डॉक्टर एसके मंजुल ने कहा, ‘फिलहाल इस साइट के धार्मिक पहलु पर कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा। हमने इस स्थान को मुख्य रूप से अन्य महत्वपूर्ण स्थानों जैसे चंदायन और सिनौली के करीब होने के कारण चुना है। सिनौली में खुदाई के दौरान हमें हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले थे। 2005 में हमें बड़ी संख्या में कंकाल और मिट्टी के बर्तन मिले थे। इसी तरह चंदायन गांव में 2014 में हमें तांबे का मुकुट मिला था।’

उस मुकुट को स्थानीय पुरातत्वेता अमित राय जैन ने खोजा था। हालांकि उस साइट पर अब ज्यादा कुछ बचा नहीं है लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह सुरंग है, जिसके बारे में कहा जाता है कि पांडवों ने इसका इस्तेमाल लाक्षागृह से भागने के लिए किया था। वह सुरंग टीले के नीचे है।

मुलतानी मल पीजी कॉलेज, मोदीनगर के इतिहास विभाग के असोसिएट प्रफेसर और कल्चर ऐंड हिस्ट्री असोसिएशन के सचिव कृष्ण कांत शर्मा ने बताया, ‘सुरंग में काफी मोड़ हैं इसलिए कोई भी इसमें काफी आगे तक नहीं गया लेकिन शायद खुदाई से इसकी लंबाई का पता चल सके।’

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