पहली बार नवरात्रि पर PAK के 2 लाख साल पुराने शक्तिपीठ से LIVE रिपोर्ट

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Source: bhaskar.com

पाकिस्तान में कैसे मनाई जाती है नवरात्रि? पहली बार पढ़ें 51 शक्तिपीठों में शामिल पाक के हिंगलाज मंदिर से लाइव रिपोर्ट…

Video: हिंगलाज यात्रा के दौरान के एक पड़ाव चंद्रकूप मड ज्वालामुखी पर नारियल चढ़ाने जाते लोग।

पाकिस्तान के लसबेला से ।अरब सागर से छूकर निकलता 150 किमी तक फैला रेगिस्तान। बगल में 1000 फीट ऊंचे रेतीले पहाड़ों से गुजरती नदी। बाईं ओर दुनिया का सबसे विशाल मड ज्वालामुखी। जंगलों के बीच दूर तक पसरा सन्नाटा और इस सन्नाटे के बीच से आती आवाज ‘जय माता दी’। इस नवरात्रि कुछ इन्हीं रास्तों से होते हुए पहुंचा धरती पर देवी माता का पहला स्थान माने जाने वाले पाकिस्तान स्थित एकमात्र शक्तिपीठ हिंगलाज मंदिर तक।

मकसद था अपने रीडर्स को ये दिखाना और बताना कि मुस्लिम देश पाकिस्तान में नवरात्रि कैसे मनाई जाती है। वहां मौजूद एकमात्र शक्तिपीठ मंदिर का हाल आज कैसा है? क्यों अमरनाथ से ज्यादा कठिन है हिंगलाज की यात्रा और पिछले जन्मों के पाप नष्ट करने वाले इस मंदिर तक कैसे पहुंचा जा सकता है?
इन सवालों के जवाब पाने के लिए पढ़ें करीब 2 लाख साल पुराने इस मंदिर से रोहिताश्व कृष्ण मिश्रा की ये नवरात्रि एक्सक्लूसिव रिपोर्ट…
नवरात्रि में गरबा से लेकर कन्या भोज तक सब होता है यहां
– दुनिया के 51 शक्तिपीठों में से एक हिंगलाज मंदिर में नवरात्रि का जश्न करीब-करीब भारत जैसा ही होता है। कई बार इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि ये मंदिर पाक में है या भारत में।
– हिंगलाज मंदिर जिस एरिया में है, वो पाकिस्तान के सबसे बड़े हिंदू बाहुल्य वाले इलाकों में से एक है। नवरात्रि के दौरान यहां 3 किमी एरिया में मेला लगता है। दर्शन के लिए आने वाली महिलाएं गरबा करती हैं। पूजा-हवन होता है। कन्याएं खिलाई जाती हैं। मां के गानों की गूंज दूर-दूर तक पहुंचती है।
– कुल मिलाकर हर वो बात देखने को मिलती है जो भारत में नवरात्रि पूजा के दौरान होती है।
नवरात्रि में हो जाती है साल भर के खर्चे के बराबर कमाई
– हिंगलाज मंदिर आने वाले भक्तों की संख्या का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नवरात्रि के 9 दिनों में यहां के लोग अपने साल भर के खर्चे के बराबर कमा लेते हैं।
– मंदिर के प्रमुख पुजारी महाराज गोपाल गिरी का कहना है कि नवरात्रि के दौरान भी मंदिर में हिंदू-मुस्लिम का कोई फर्क नहीं दिखता है। कई बार पुजारी-सेवक मुस्लिम टोपी पहने दिखते हैं। वहीं, मुस्लिम भाई देवी माता की पूजा के दौरान साथ खड़े मिलते हैं। इनमें से अधिकतर बलूचिस्तान-सिंध के होते हैं।
अमेरिका और बाकी देशों से यहां आते हैं भक्त
– हर साल पड़ने वाले 2 नवरात्रों में यहां सबसे ज्यादा भीड़ होती है। करीब 10 से 25 हजार भक्त रोज माता के दर्शन करने हिंगलाज आते हैं। इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश के अलावा अमेरिका और ब्रिटेन से भी लोग आते हैं।
– चूंकि हिंगलाज मंदिर को मुस्लिम ‘नानी बीबी की हज’ या पीरगाह के तौर पर मानते हैं, इसलिए पीरगाह पर अफगानिस्तान, इजिप्ट और ईरान के लोग भी आते हैं।
– बता दें, 2006 में बीजेपी नेता और पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह पाक के तात्कालिक प्रेसिडेंट परवेज मुशर्रफ से स्पेशल परमिशन लेकर हिंगलाज माता के दर्शन करने गए थे।
भगवान शंकर की पत्नी सती का सिर कटकर गिरने से बना हिंगलाज
– हिंदू धर्म शास्त्रों और पुराणों के मुताबिक, सती के पिता राजा दक्ष अपनी बेटी का विवाह भगवान शंकर से होने से खुश नहीं थे। क्रोधित दक्ष ने बेटी का बहुत अपमान किया था। इससे दुखी सती ने खुद को हवनकुंड में जला डाला। इसे देखकर शंकर के गणों ने राजा दक्ष का वध कर दिया था।
– घटना की खबर पाते ही शंकरजी दक्ष के घर पहुंचे। फिर सती के शव को कंधे पर उठाकर क्रोध में नृत्य करने लगे। शंकरजी को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से सती के 51 टुकड़े कर दिए।
– ये टुकड़े जहां-जहां गिरे, उन 51 जगहों को ही देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है। टुकड़ों में से सती के शरीर का पहला हिस्सा यानी सिर किर्थर पहाड़ी पर गिरा, जिसे आज हिंगलाज के नाम से जानते हैं। इसी पहले हिस्से यानी सिर के चलते पाकिस्तान के हिंगलाज मंदिर को धरती पर माता का पहला स्थान कहते हैं।
आगे की स्लाइड्स पर क्लिक कर पढ़ें क्यों अमरनाथ से भी ज्यादा कठिन मानी जाती है पाकिस्तान के हिंगलाज माता की यात्रा… साथ ही, जानें मुस्लिम हिंगलाज माता के मंदिर को हज कहते हुए क्यों करते हैं यहां पूजा…
हमारे जर्नलिस्ट के अलावा अन्य कंटेंट सोर्स:पाकिस्तान हिंदू सेवा के प्रेसिडेंट संजेश धनजा, हिंगलाज सेवा मंडली के ऑर्गनाइजर, हिंगलाज मंदिर के मुख्य पुजारी महाराज गोपाल गिरी, ब्रिटिश शासन के दौरान बलूचिस्तान के हेड रहे मेजर सी. एफ. मिचिंग की 1907 में छपी बुक “Baluchistan District Gazetter”, 1831 में अफगानिस्तान सहित ब्लूचिस्तान के ब्रिटिशर्स हेड रहे एलेक्जेंडर बर्नेस की बुक “A Voyage on the Indus”।

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