सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें, अशांत नहीं होंगे

9

Source: bhaskar.com

यात्रा में कुली लगता है, यह तो सबको समझ में आता है पर जीवन की यात्रा में कुछ बोझ ऐसे होते हैं, जिन्हें उठाना नहीं चाहिए
 सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें, अशांत नहीं होंगे
हम कुलीक्यों करते हैं? इसलिए कि हमारे पास जितना बोझ होता है उसे उठा नहीं पाते और किसी की आवश्यकता लगती है, जो उस वजन को उठा सके। यात्रा में कुली लगता है, यह तो सबको समझ में आता है पर जीवन की यात्रा में कुछ बोझ ऐसे होते हैं, जिन्हें उठाना नहीं चाहिए और हम उठा लेते हैं। ऐसे ही कुछ वजन स्मृतियों के, स्वार्थ के होते हैं। धीरे-धीरे ये इतने भारी हो जाते हैं कि हमारी चाल लड़खड़ा जाती है। शास्त्रों में एक शब्द आया है- रिक्त हो जाएं तो ईश्वर जल्दी मिल जाता है। रिक्त होने का अर्थ है थोड़ा खाली या निर्भार हो जाएं। अभी हम बहुत भारी हैं। अपने भीतर अहंकार का, हिंसा का, तनाव का इतना भार पैदा कर लिया है कि दबे ही जा रहे हैं। निर्भार होते ही भीतर शांति जागती है, आप प्रेमपूर्ण हो जाते हैं, जीवन में परमात्मा उतर आता है। परमात्मा के आते ही हम कहने लगते हैं- बस, अब जीवन की गाड़ी आप ही चलाइए। एक बार राजस्थान में यात्रा के समय टैक्सी ड्राइवर ने मुझे बार-बार हुकम, हुकम कहा। मैने पूछा- आप हमें हुकम क्यों कहते हैं? इसका मतलब तो आदेश होता है। तब उसने कहा- मैं जानता हूं हुकम का मतलब आदेश है पर मैं इसलिए कह रहा हूं कि आप ही हमारे आदेश हैं। नानकजी ने भी एक जगह ईश्वर के लिए लिखा था-‘हुजूर का हुकूम’। जिस दिन हम परमात्मा को हुकूम या आदेश मान लेते हैं, उस दिन निर्भार हो जाते हैं। फिर कैसा भी काम करें, अशांत नहीं होंगे, क्योंकि आप जानते हैं हुक्म कोई और दे रहा है, हुकम कोई और है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here