कश्मीरी पंडित के स्कूल में इस्लाम की भी पढ़ाई

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Source: bbc.com

मुश्किल हालात में जब उनके आस-पास के लोग कश्मीर छोड़ रहे थे, वो मुश्किल हालात में भी वहां बसे रहे और अब एक स्कूल चलाते हैं जो हर मज़हब के लिए समावेशी है.

संजय वर्मा ने भारत-प्रशासित कश्मीर के गांदरबल में विजय मेमोरियल एजुकेशनल इंस्टिट्यूट की शुरुआत की थी. आज इस स्कूल में 1100 मुसलमान छात्र पढ़ते हैं.

पंडित छात्रों की संख्या सिर्फ 15 है. स्कूल में क़रीब पचास शिक्षक हैं, जिनमें सिर्फ छह ग़ैर मुस्लिम हैं.

‘क्योंकि मां चाहती थीं’

संजय वर्मा

संजय वर्मा एक कश्मीरी पंडित हैं, जो विस्थापन के दौर में भी कश्मीर छोड़कर नहीं गए.

वह कहते हैं, “साल 2000 में मेरी मां का एक हादसे में निधन हो गया था. वह शिक्षिका थीं और बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाती थीं. जिस दिन उनकी मौत हुई, हमारे घर में वे मुसलमान बच्चे जमा हो गए, जिन्हें वे पढ़ाती थीं. वे रोते रोते कह रहे थे कि हमारी मां मर गई हैं.”

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संजय के मुताबिक, मां के देहांत के पास उनके पास यही विकल्प था कि कश्मीर में अपनी सब जायदाद बेच कर निकल जाएं. लेकिन मां चाहती थीं कि यहां पढ़ाई चलती रही. लिहाज़ा मां का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने स्कूल शुरू का फैसला किया.

लेकिन यह सफ़र आसान नहीं था. पहले साल स्कूल में सिर्फ सिर्फ सात बच्चों का दाख़िला हुआ था.

इस्लामी शिक्षा भी

कश्मीर से विस्थापन के सवाल पर संजय वर्मा कहते हैं, “हमारे परिवार को कुछ ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमें कश्मीर छोड़ देना चाहिए. हमें अपने मुसलमान पड़ोसियों से इतना प्यार मिला कि कश्मीर छोड़ने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई.”

साल 1990 में कश्मीर घाटी में हथियारबंद आंदोलन के बाद लाखों कश्मीरी पंडित वहां से विस्थापित हो गए और भारत के दूसरे राज्यों में जाकर बस गए.

मुसलमान बच्चों के लिए संजय वर्मा ने धार्मिक शिक्षक भी रखे हैं और उन्हें मुक़म्मल धार्मिक शिक्षा भी दी जाती है.

वह कहते हैं, “मैं चाहता हूं कि जो भी मुसलमान छात्र यहां से निकले वह अच्छा मुसलमान बनकर निकले. जो हिंदू छात्र यहां से निकले वह भी अच्छा बनकर निकले.”

संजय कहते हैं कि शिक्षा के मैदान में न कोई हिंदू होता है और न कोई मुसलमान.

यहां पढ़ने वाले पंडित छात्रों के गहरे दोस्त मुसलमान छात्र हैं. दसवीं की छात्रा ईशा रैना की सबसे अच्छी दोस्त सादिया हैं. दोनों डॉक्टर बनना चाहती हैं.

सादिया कहती हैं, ‘हमारे यहां स्कूल में कई मुसलमान छात्राएं पढ़ती हैं, लेकिन ईशा मेरी अच्छी दोस्त है. मेरा दाखिला ईशा से पहले हुआ था. जब वह मेरी क्लास में आई तो धीरे-धीरे हम काफी घुल-मिल गए. दोस्ती का सफर अभी तक चल रहा है.’

ईशा के लिए भी यह दोस्ती बेशकीमती है. वह कहती हैं, “पहले हम दोनों होमवर्क में एक-दूसरे की मदद करते थे, फिर हम दोस्त बन गए. हम एक दूसरे के घर भी आते जाते हैं. त्योहारों पर मुबारकबाद देते हैं. हमारे घर वाले भी त्योहारों पर एक दूसरे को मुबारकबाद देते हैं.”

‘क्योंकि वही मेरी मदद करता है’

इसी तरह आठवीं के छात्र राहुल और अयान की दोस्ती भी गहरी है. राहुल कहते हैं, “मुझे हमेशा अयान में एक अच्छा इंसान नज़र आया. जब भी कोई परेशानी होती थी तो अयान मेरी मदद करता था.”

अयान कहते हैं, “हमारा दाख़िला एक साथ हुआ था. जब मेरे पास लंच नहीं होता था तो राहुल मुझे खिलाता था. हम हर चीज़ साझा करते हैं. मैंने राहुल को इसलिए चुना क्योंकि वो मेरी मदद करता है. मेरे पास कभी कलम-कॉपी वगैरह नहीं होता तो राहुल से ही लेता हूं.”

स्कूल में ‘स्पेशल’ बच्चों के लिए भी इंतज़ाम किया गया है. ऐसी ही दो छात्राएं महविश और रिंको हैं जो बोल तो नहीं पातीं, लेकिन अपनी हर चीज़ एक-दूसरे से मिल-बांटकर खाती हैं.

‘इस्लाम पढ़ाने के लिए क्या होगा’

स्कूल में इस्लाम पढ़ाने वाले मुश्ताक अहमद बताते हैं कि शुरू शुरू में लोगों ने मुझसे कहा कि क्या मालूम इस्लामियत पढ़ाने के हवाले से वहां कुछ होगा भी या नहीं.

लेकिन सवाल पूछने वालों की यह धारणा ग़लत निकली.

वह कहते हैं, ‘मैं कई साल से यहां पढ़ाता हूं. कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मुझे अपना इस्लामियत मज़मून पढ़ाने में कोई परेशानी आई हो. जिस अंदाज़ से संजय वर्मा ने यह स्कूल चलाया है, वह बहादुरी का काम है.’

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