ये हैं सप्तऋषियों में एक, इन्होंने लिए 3 जन्म

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Source: religion.bhaskar.com

श्रीराम के परम भक्त भारद्वाज ऋषि के नाम पर ही भरद्वाज गोत्र आरंभ हुआ, इसकारण गोत्र-प्रवर्तक ऋषि कहलाए।
 ये हैं सप्तऋषियों में एक, इन्होंने लिए 3 जन्म
प्रसिद्ध सप्त-ऋषियों में से एक महर्षि भरद्वाज हैं। लोक कल्याण के लिए ज्ञान प्राप्त करना ही इनके जीवन का मुख्य लक्ष्य रहा। वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन्होंने सौ-सौ वर्ष के तीन जन्म लिए। भरद्वाज ऐसे ऋषि थे जो मंत्रदृष्टा होने के साथ आयुर्वेद के भी बड़े आचार्य थे और बहुत अच्छे साम गायक भी थे। इसीलिए चार प्रमुख साम गायकों में इनका नाम है। लोगों के कल्याण के लिए इन्होंने कई ग्रंथों की रचना की। उन्होंने ज्ञान अर्जित किया और उसे जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। यही कारण है कि वेदों और पुराणों में भी इनकी महिमा बताई गई है। श्रीराम के परम भक्त भारद्वाज ऋषि के नाम पर ही भरद्वाज गोत्र आरंभ हुआ, इसकारण गोत्र-प्रवर्तक ऋषि कहलाए। सभी ऋषियों में सबसे अधिक आयु इनकी ही मानी गई है।
इसलिए कहलाए भरद्वाज
भरद्वाज ऋषि आंगिरस वंश में उत्पन्न हुए थे। बृहस्पति इनके पिता और माता का नाम था ममता, लेकिन पैदा होते ही माता-पिता में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि इस संतान का पालन-पोषण कौन करेगा? दोनों ने एक दूसरे से कहा भरद्वाजमिमम् यानी तुम इसे संभालो। बस, तभी से इनका नाम भरद्वाज पड़ा, लेकिन इन्होंने अपनी तपस्या के बल पर इसी नाम को अमर कर दिया। बाद में राजकुल में इनका लालन-पालन हुआ। वैशाली नरेश मरुत्त ने इनको पाला-पोसा। पुराणों में कहा गया है कि मरुत्त देवता ने इनका पालन-पोषण किया।
तीन जन्मों का वरदान
तैत्तिरीय ब्राह्मण नामक ग्रंथ में कथा है- भरद्वाज ने इन्द्र को अपनी तपस्या से प्रसन्न कर सौ-सौ वर्ष के तीन जन्मों का वरदान मांगा था। दरअसल भरद्वाज वेदों का अध्ययन करना चाहते थे, लेकिन समय की कमी के कारण ऐसा न कर सके। तब इन्द्र को तप से प्रसन्न किया। कहते हैं तीन जन्मों के बाद भी ये वेदों का पूरी तरह से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके। तब पुन: इन्द्र से चौथा जन्म भी मांगा। इस बार इन्द्र ने एक उपाय बताया। कहा सवित्राग्रिचयन यज्ञ करो। इन्होंने ऐसा ही किया तब कहीं जाकर इनकी जिज्ञासा पूर्ण हो सकी।
श्रीराम से अनन्य अनुराग
महर्षि भरद्वाज का श्रीराम से अनन्य प्रेम था। रामायण के अनुसार दंडकारण्य में जाते समय श्रीराम इनके आश्रम गए थे। कहते हैं भरद्वाज ने बड़े प्रेम से सत्कार किया था। श्रीराम ने इनसे रहने के लिए स्थान भी मांगा था। तब इन्होंने अपना आश्रम ही लेने का अनुरोध किया था, लेकिन श्रीराम ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। तब चित्रकूट में श्रीराम के लिए व्यवस्था की थी। रावण का वध करने के बाद भी श्रीराम इनके पास आए थे।

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