अपने ही घर पर क्यों करना चाहिए श्राद्ध? ये है सही कारण

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Source: religion.bhaskar.com

श्राद्ध पितरों को प्रसन्न करने का एक माध्यम है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध स्वयं की भूमि या घर पर ही करना चाहिए।

अपने ही घर पर क्यों करना चाहिए श्राद्ध? ये है सही कारण

श्राद्ध पितरों को प्रसन्न करने का एक माध्यम होता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध स्वयं की भूमि या घर पर ही करना श्रेष्ठ होता है, किसी दूसरे के घर में या भूमि पर श्राद्ध कभी नहीं करना चाहिए। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्रीय निर्देश हैं कि दूसरे के घर में जो श्राद्ध किया जाता है, उसमें श्राद्ध करने वाले के पितरों को कुछ नहीं मिलता। गृह स्वामी के पितर बलपूर्वक सब छीन लेते हैं-

अपने ही घर पर क्यों करना चाहिए श्राद्ध? ये है सही कारण

श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार हैं-

1. तर्पण-इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
2. भोजन व पिंडदान- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिंडदान भी किए जाते हैं।
3. वस्त्र दान-श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करवाने के बाद वस्त्र दान अवश्य करना चाहिए।

4. दक्षिणादान-यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है, जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती, उसका फल नहीं मिलता।

जब ब्राह्मणों में राजा दशरथ को देखा सीता ने

श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें भोजन कराने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि ब्राह्मणों द्वारा किया हुआ भोजन हमारे पितरों को प्राप्त होता है। ऐसी ही एक कथा का वर्णन हमारे पद्म पुराण में भी मिलता है उसके अनुसार-
जब भगवान राम वनवास में थे, तब श्राद्ध पक्ष में उन्होंने अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध किया। सीताजी ने अपने हाथों से सब सामग्री तैयार की, परंतु जब निमंत्रित ब्राह्मण भोजन के लिए आए तो सीताजी उनको देखकर कुटिया में चली गईं। भोजन के बाद जब ब्राह्मण चले गए तो श्रीराम ने इसका कारण पूछा। तब सीताजी ने कहा कि-
पिता तव मया दृष्यो ब्राह्मणंगेषु राघव।
दृष्टवा त्रपान्विता चाहमपक्रान्ता तवान्तिकात्।।
याहं राज्ञा पुरा दृष्टा सर्वालंकारभूषिता।
सा स्वेदमलदिग्धांगी कथं पश्यामि भूमिपम्।।
(पद्म पुराण सृष्टि 33/74/110)

अर्थात- हे राघव। मैंने निमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में आपके पिताजी का दर्शन किया। इसलिए लज्जित होकर मैं आपके निकट से दूर चली गई। मेरे श्वसुर ने पहले मुझे सब आभूषणों और अलंकारों से सुसज्जित देखा था, अब वे मुझे इस अवस्था में कैसे देख पाते।

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